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उत्तर आधुनिकतावाद (Postmodernism) क्या है? इतिहास पर उतर आधुनिकतावादी दृष्टिकोण की विवेचना कीजिए

उत्तर आधुनिकतावाद: अर्थ एवं इतिहास पर इसका दृष्टिकोण

उत्तर आधुनिकतावाद (Postmodernism) एक बौद्धिक आंदोलन है, जिसने 20वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में कला, साहित्य, दर्शन, समाजशास्त्र और इतिहास सहित कई क्षेत्रों को प्रभावित किया। यह आधुनिकतावादी विचारों को चुनौती देता है और यह तर्क प्रस्तुत करता है कि सत्य, ज्ञान और वास्तविकता सापेक्ष (relative) होते हैं, पूर्ण नहीं

इतिहास लेखन में उत्तर आधुनिकतावाद ने पारंपरिक ऐतिहासिक पद्धतियों को चुनौती दी और यह तर्क दिया कि इतिहास केवल तथ्य नहीं है, बल्कि एक व्याख्या है, जो विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक प्रभावों से निर्मित होती है

इस लेख में हम उत्तर आधुनिकतावाद की अवधारणा, इसकी विशेषताएँ और इतिहास लेखन पर इसके प्रभाव की विस्तृत विवेचना करेंगे।

उत्तर आधुनिकतावाद क्या है?

उत्तर आधुनिकतावाद एक बौद्धिक और दार्शनिक प्रवृत्ति है, जो आधुनिकतावाद (Modernism) की सीमाओं को उजागर करता है और तर्क देता है कि सत्य और ज्ञान सार्वभौमिक नहीं होते, बल्कि समाज, भाषा और संदर्भ के आधार पर बदलते रहते हैं


उत्तर आधुनिकतावाद की प्रमुख विशेषताएँ

  1. सत्य की सापेक्षता (Relativity of Truth) – उत्तर आधुनिकतावाद यह मानता है कि कोई भी सत्य पूर्ण या सार्वभौमिक नहीं होता, बल्कि यह विभिन्न संदर्भों पर निर्भर करता है।

  2. भाषा और पाठ की व्याख्या (Interpretation of Texts) – भाषा केवल एक संप्रेषण का माध्यम नहीं है, बल्कि यह वास्तविकता को भी गढ़ती है। विभिन्न लोगों द्वारा एक ही पाठ को अलग-अलग तरीके से समझा जा सकता है।

  3. बड़े आख्यानों (Grand Narratives) का विरोध – यह विचारधारा महान ऐतिहासिक आख्यानों (जैसे – राष्ट्रवाद, विज्ञान, प्रगति) को प्रश्नों के घेरे में रखती है

  4. असंगति और विविधता को स्वीकार करना – उत्तर आधुनिकतावाद एकल दृष्टिकोण को अस्वीकार करता है और बहुलता (pluralism) को स्वीकार करता है

  5. शक्ति और विचारधारा की आलोचना – यह विचारधारा तर्क देती है कि जो कुछ भी सत्य प्रतीत होता है, वह दरअसल शक्ति और वर्चस्व (power and dominance) के कारण स्थापित होता है


इतिहास पर उत्तर आधुनिकतावादी दृष्टिकोण

पारंपरिक इतिहास लेखन का मानना है कि इतिहास तथ्यों और प्रमाणों पर आधारित एक निष्पक्ष अध्ययन है। लेकिन उत्तर आधुनिकतावादी इतिहासकारों का तर्क है कि इतिहास पूरी तरह से वस्तुनिष्ठ (objective) नहीं हो सकता, क्योंकि:

  1. इतिहास लेखन एक व्याख्या है – इतिहासकार जब किसी घटना का विश्लेषण करते हैं, तो उनकी सोच, विचारधारा और समाज से प्रभावित होती है।

  2. इतिहास के स्रोत भी पूर्वाग्रहों से मुक्त नहीं होते – ऐतिहासिक अभिलेख, ग्रंथ और दस्तावेज भी किसी न किसी विशेष वर्ग, समुदाय या सत्ता के दृष्टिकोण से लिखे गए होते हैं

  3. इतिहास में शक्ति और राजनीति का प्रभाव – यह विचारधारा मानती है कि इतिहास लेखन सत्ता संरचनाओं (power structures) से प्रभावित होता है। विजेता हमेशा इतिहास को अपने तरीके से प्रस्तुत करते हैं।


उत्तर आधुनिकतावाद और पारंपरिक इतिहास लेखन के बीच अंतर

विशेषता
पारंपरिक इतिहास लेखन
उत्तर आधुनिकतावादी 
उत्तर आधुनिकतावादी इतिहास लेखन
सत्यएकल और सार्वभौमिकबहुलतावादी और संदर्भ आधारित
इतिहास की प्रकृतिवस्तुनिष्ठ (objectiveव्यक्तिनिष्ठ (subjective)
स्रोतों की व्याख्याप्रमाणों पर आधारितभाषा, शक्ति और विचारधारा से प्रभावित
इतिहास लेखन का उद्देश्यअतीत की सही जानकारी देनायह दिखाना कि इतिहास भी एक रचना है
निरंतरता (Continuity)ऐतिहासिक घटनाएँ एक निश्चित क्रम में होती हैंघटनाएँ टुकड़ों में बंटी होती हैं, जिनकी अलग-अलग व्याख्याएँ हो सकती हैं


उत्तर आधुनिकतावादी इतिहासकार और उनके विचार

(1) मिशेल फूको (Michel Foucault)

फूको ने तर्क दिया कि ज्ञान और शक्ति एक-दूसरे से जुड़े होते हैं
उन्होंने यह दिखाया कि इतिहास केवल अतीत का निष्पक्ष अध्ययन नहीं है, बल्कि यह शक्ति के प्रयोग का एक साधन है

(2) जाक देरिदा (Jacques Derrida)

उन्होंने डिकंस्ट्रक्शन (Deconstruction) सिद्धांत प्रस्तुत किया, जिसके अनुसार किसी भी पाठ की अनेक व्याख्याएँ हो सकती हैं

इतिहास केवल तथ्यों का संकलन नहीं है, बल्कि यह भी एक साहित्यिक संरचना है

हेडन वाइट (Hayden White)

हेडन वाइट ने कहा कि इतिहास लेखन साहित्यिक तकनीकों पर निर्भर करता है

उन्होंने बताया कि इतिहासकार अपनी व्याख्या में रूपकों (metaphors) और कथानकों (narratives) का प्रयोग करते हैं, जिससे इतिहास एक साहित्यिक रचना बन जाता है

उत्तर आधुनिकतावाद की आलोचना

  1. इतिहास के प्रति अति-निराशावादी दृष्टिकोण – उत्तर आधुनिकतावादी दृष्टिकोण के अनुसार कोई भी ऐतिहासिक सत्य संभव नहीं है, जिससे इतिहास के अध्ययन का उद्देश्य ही प्रश्नों के घेरे में आ जाता है।

  2. विज्ञान और तर्क का अविश्वास – यह दृष्टिकोण वैज्ञानिक और तार्किक विधियों को भी संदेह की दृष्टि से देखता है, जिससे इसके विचार अतिवादी प्रतीत होते हैं।

  3. सत्य और नैतिकता की अनिश्चितता – यदि हर चीज व्याख्या पर निर्भर करती है, तो फिर नैतिकता और मूल्यों का भी कोई निश्चित आधार नहीं रहता।

  4. व्यावहारिक उपयोगिता का अभाव – उत्तर आधुनिकतावाद के विचार इतिहासकारों के लिए शोध और अध्ययन को कठिन बना सकते हैं, क्योंकि यह किसी भी निष्कर्ष तक पहुँचने को चुनौती देता है।

निष्कर्ष

उत्तर आधुनिकतावाद ने इतिहास लेखन की पारंपरिक धारणाओं को गहराई से प्रभावित किया है। इसने यह दिखाया कि इतिहास केवल अतीत की घटनाओं का संकलन नहीं है, बल्कि यह भी एक प्रकार की व्याख्या और शक्ति का माध्यम है

हालाँकि, इसकी अत्यधिक संशयवादी प्रवृत्ति के कारण इसे आलोचनाएँ भी मिलीं। फिर भी, इसने इतिहासकारों को नई पद्धतियों और दृष्टिकोणों को अपनाने के लिए प्रेरित किया

अतः, उत्तर आधुनिकतावादी दृष्टिकोण इतिहास को अधिक गहराई से समझने में सहायक हो सकता है, लेकिन इसे संपूर्ण सत्य मानना भी उचित नहीं होगा। 


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