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भारत में सबाल्टर्न अध्ययन (Subaltern Studies) पर एक टिप्पणी लिखिए

भारत में सबाल्टर्न अध्ययन: एक टिप्पणी

सबाल्टर्न अध्ययन (Subaltern Studies) भारतीय इतिहास-लेखन की एक महत्वपूर्ण प्रवृत्ति रही है, जिसने औपनिवेशिक और पारंपरिक इतिहास-लेखन की सीमाओं को चुनौती दी। इस अध्ययन की शुरुआत 1980 के दशक में रणजीत गुहा (Ranajit Guha) के नेतृत्व में हुई, जिसका उद्देश्य भारतीय इतिहास को "नीचे से" देखने की कोशिश करना था

सबाल्टर्न अध्ययन का मुख्य फोकस उन वर्गों पर था जिन्हें पारंपरिक इतिहास-लेखन में नजरअंदाज किया गया था, जैसे किसान, श्रमिक, आदिवासी, दलित, महिलाएँ और अन्य हाशिए पर रहने वाले समुदाय। इस अध्ययन ने यह स्थापित करने की कोशिश की कि भारतीय इतिहास केवल औपनिवेशिक शासकों या राष्ट्रवादी नेताओं के कार्यों से नहीं बना, बल्कि इसमें आम जनता की भी महत्वपूर्ण भूमिका थी।

सबाल्टर्न अध्ययन की परिभाषा

सबाल्टर्न शब्द इटालियन मार्क्सवादी चिंतक एंटोनियो ग्राम्शी (Antonio Gramsci) द्वारा दिया गया था, जिसका अर्थ है – "हाशिए पर रहने वाले लोग" या "सत्ता से वंचित वर्ग"

सबाल्टर्न अध्ययन समूह ने इस अवधारणा को भारतीय इतिहास पर लागू किया और यह दिखाने की कोशिश की कि इतिहास केवल शासकों, अभिजात वर्ग या औपनिवेशिक अधिकारियों द्वारा नहीं बनाया गया, बल्कि आम लोग भी इतिहास निर्माण में सक्रिय रूप से शामिल थे। 


भारत में सबाल्टर्न अध्ययन की उत्पत्ति और विकास

1. रणजीत गुहा और सबाल्टर्न स्टडीज़ ग्रुप

• रणजीत गुहा ने 1982 में "सबाल्टर्न स्टडीज़" (Subaltern Studies) नामक पहला संकलन प्रकाशित किया, जिसमें पारंपरिक इतिहास-लेखन की आलोचना की गई।

 उन्होंने तर्क दिया कि भारतीय इतिहास-लेखन में केवल राष्ट्रीय आंदोलन के अभिजात्य नेताओं (जैसे गांधी, नेहरू) और औपनिवेशिक शासन के कार्यों को प्रमुखता दी गई है, जबकि आम जनता की भागीदारी की अनदेखी की गई है।

 सबाल्टर्न अध्ययन ने इस विचार को खारिज किया कि भारतीय जनता केवल राष्ट्रवादी नेताओं के निर्देशों का पालन करती थी, बल्कि उसने स्वयं भी स्वतंत्र संघर्ष किए और विद्रोह किए।


2. प्रमुख विचारधाराएँ और सिद्धांत

सबाल्टर्न अध्ययन में मुख्य रूप से मार्क्सवाद, उत्तर-औपनिवेशिक सिद्धांत (Postcolonial Theory), और संरचनावाद (Structuralism) का उपयोग किया गया।

• यह अध्ययन इस विचार पर आधारित था कि इतिहास केवल शासकों और नायकों की गाथा नहीं है, बल्कि उसमें सामान्य वर्गों की भूमिका को भी समझना आवश्यक है।

• इसमें विशेष रूप से ग्रामीण किसान विद्रोह, श्रमिक आंदोलनों, दलित प्रतिरोध और आदिवासी संघर्षों पर ध्यान केंद्रित किया गया।

भारत में सबाल्टर्न अध्ययन के प्रमुख विषय

1. किसान और जन आंदोलन

• सबाल्टर्न अध्ययन ने यह दिखाया कि भारत में किसान विद्रोह केवल औपनिवेशिक दमन के परिणाम नहीं थे, बल्कि उनमें किसानों की अपनी स्वतंत्र इच्छाएँ और संघर्ष निहित थे।

• उदाहरण के लिए, 1857 का विद्रोह केवल एक सैनिक विद्रोह नहीं था, बल्कि इसमें किसानों और आम जनता की सक्रिय भागीदारी थी। 
 

2. आदिवासी प्रतिरोध

• आदिवासी समुदायों को अक्सर भारतीय इतिहास में हाशिए पर रखा गया, लेकिन सबाल्टर्न अध्ययन ने आदिवासी विद्रोहों (जैसे संथाल विद्रोह, भील विद्रोह) को ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण माना।

• इन विद्रोहों को केवल ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष के रूप में नहीं देखा गया, बल्कि उन्हें स्वतंत्र आदिवासी पहचान और सांस्कृतिक प्रतिरोध का हिस्सा माना गया।

3. औपनिवेशिक शासन और भारतीय समाज

• सबाल्टर्न अध्ययन ने यह दिखाया कि औपनिवेशिक शासन ने भारतीय समाज की संरचना को कैसे प्रभावित किया

• यह तर्क दिया गया कि ब्रिटिश शासन ने भारतीय समाज को विभाजित करने के लिए जाति और वर्ग विभाजन को बढ़ावा दिया

• ब्रिटिश औपनिवेशिक रिकॉर्ड्स का आलोचनात्मक विश्लेषण करके, सबाल्टर्न इतिहासकारों ने यह दिखाया कि कैसे औपनिवेशिक प्रशासन ने भारतीय समाज को एक अधीनस्थ स्थिति में बनाए रखा। 

4. दलित और हाशिए पर रहने वाले समुदायों का इतिहास

• पारंपरिक इतिहास-लेखन में दलितों की भूमिका को नगण्य माना गया, लेकिन सबाल्टर्न अध्ययन ने यह दिखाया कि दलितों ने सामाजिक और राजनीतिक संघर्षों में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

• डॉ. बी.आर. अंबेडकर जैसे नेताओं के संघर्ष और अछूत आंदोलन को सबाल्टर्न दृष्टिकोण से देखा गया।

5. महिलाओं का इतिहास

• पारंपरिक इतिहास-लेखन में महिलाओं की भूमिका को अक्सर गौण माना गया, लेकिन सबाल्टर्न अध्ययन ने यह दिखाया कि महिलाओं ने स्वतंत्रता संग्राम और सामाजिक आंदोलनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

• महिला किसानों, श्रमिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के योगदान को इतिहास में जगह देने की कोशिश की गई।

सबाल्टर्न अध्ययन की आलोचना

हालाँकि, सबाल्टर्न अध्ययन को कुछ आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ा:

1. अति-सिद्धांतिकता (Over-Theorization):


• कुछ विद्वानों का मानना है कि सबाल्टर्न अध्ययन इतिहास से ज्यादा सैद्धांतिक बहसों पर केंद्रित हो गया

• इसमें वास्तविक ऐतिहासिक साक्ष्यों (Historical Evidence) की तुलना में सिद्धांतों और विचारधाराओं को अधिक महत्व दिया गया


2. राष्ट्रीय आंदोलन की भूमिका की अनदेखी:

• सबाल्टर्न अध्ययन ने यह दिखाने की कोशिश की कि भारतीय राष्ट्रवाद केवल उच्च वर्गों (Elite) का आंदोलन था, लेकिन कई इतिहासकारों ने इस तर्क का विरोध किया।

• यह कहा गया कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में आम जनता की भागीदारी को पूरी तरह से नकारना सही नहीं है।

3. ब्रिटिश शासन की भूमिका का सीमित विश्लेषण:

• सबाल्टर्न अध्ययन ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के प्रभावों को पूरी तरह से समझने में असफल रहा।

• कुछ आलोचकों का मानना है कि औपनिवेशिक नीतियों और उनके प्रभाव का विश्लेषण और अधिक विस्तृत हो सकता था।

निष्कर्ष

भारत में सबाल्टर्न अध्ययन ने इतिहास-लेखन की पारंपरिक धारणाओं को चुनौती दी और हाशिए पर रहने वाले वर्गों की भूमिका को केंद्र में लाने का प्रयास किया। इस अध्ययन ने यह दिखाया कि भारतीय इतिहास केवल अभिजात वर्ग द्वारा निर्मित नहीं हुआ, बल्कि इसमें किसानों, श्रमिकों, दलितों, महिलाओं और आदिवासियों की भी महत्वपूर्ण भूमिका थी।

हालाँकि, इस अध्ययन की कुछ सीमाएँ और आलोचनाएँ भी हैं, लेकिन इसका महत्व इस तथ्य में निहित है कि इसने इतिहास-लेखन के नए तरीके प्रस्तुत किए और भारतीय समाज को समझने के लिए एक नया दृष्टिकोण दिया

आज भी, सबाल्टर्न अध्ययन इतिहास, समाजशास्त्र और सांस्कृतिक अध्ययन में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है और यह हमें यह समझने में मदद करता है कि इतिहास केवल सत्ता के गलियारों में नहीं बनता, बल्कि आम लोगों के संघर्षों और उनके आंदोलनों में भी इतिहास का निर्माण होता है


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