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भारतीय इतिहास पर उपनिवेशवादी इतिहास लेखन: एक टिप्पणी

भारतीय इतिहास पर उपनिवेशवादी इतिहास लेखन: एक टिप्पणी


भारतीय इतिहास को विभिन्न इतिहासकारों ने अपने दृष्टिकोण के आधार पर लिखा है। इनमें से एक प्रमुख दृष्टिकोण उपनिवेशवादी इतिहास लेखन (Colonial Historiography) है, जो मुख्य रूप से ब्रिटिश इतिहासकारों द्वारा विकसित किया गया। इस इतिहास लेखन की पद्धति में भारत के अतीत को ब्रिटिश शासन के संदर्भ में देखा गया और भारतीय समाज को एक पिछड़े और अराजक समाज के रूप में चित्रित किया गया।

यह लेख उपनिवेशवादी इतिहास लेखन के उद्देश्यों, इसकी विशेषताओं, सीमाओं और इसके प्रभावों की गहन समीक्षा करेगा।

उपनिवेशवादी इतिहास लेखन क्या है?

उपनिवेशवादी इतिहास लेखन वह विधि है जिसमें औपनिवेशिक शक्तियों (मुख्यतः ब्रिटिश) ने भारत के इतिहास को अपने दृष्टिकोण से लिखा। इसका मुख्य उद्देश्य अपने शासन को वैध ठहराना और भारतीय समाज की नकारात्मक छवि प्रस्तुत करना था, ताकि यह दिखाया जा सके कि भारत को सभ्य बनाने के लिए ब्रिटिश शासन आवश्यक था।

ब्रिटिश इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास को तीन भागों में विभाजित किया:

  1. प्राचीन काल (Hindu Period)

  2. मध्यकाल (Muslim Period)

  3. आधुनिक काल (British Period)

इस विभाजन का मुख्य उद्देश्य यह दिखाना था कि मुस्लिम शासनकाल असहिष्णु और अस्थिर था, जिससे मुक्ति केवल ब्रिटिश शासन द्वारा ही संभव हुई

उपनिवेशवादी इतिहास लेखन के प्रमुख उद्देश्य

  1. ब्रिटिश शासन को श्रेष्ठ साबित करना – यह दिखाने का प्रयास किया गया कि भारत का इतिहास अव्यवस्थित था और ब्रिटिश शासन ने इसे स्थिरता प्रदान की।

  2. भारतीय समाज को विभाजित करना – हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच विभाजन को बढ़ावा देने के लिए इतिहास को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया गया।

  3. भारतीय परंपराओं और व्यवस्थाओं को पिछड़ा साबित करना – भारतीय समाज को एक अंधविश्वासी और अव्यवस्थित समाज के रूप में चित्रित किया गया।

  4. औपनिवेशिक प्रशासन को वैध ठहराना – यह प्रचार किया गया कि भारतीयों में आत्म-शासन की योग्यता नहीं है और ब्रिटिश शासन ही भारत के विकास के लिए आवश्यक है।


उपनिवेशवादी इतिहास लेखन की प्रमुख विशेषताएँ

(1) भारतीय समाज की नकारात्मक छवि प्रस्तुत करना

ब्रिटिश इतिहासकारों ने भारतीय संस्कृति, परंपराओं और शासन व्यवस्थाओं को अराजक और अव्यवस्थित बताया। उन्होंने यह दिखाने की कोशिश की कि भारत में सामाजिक समानता, विधि व्यवस्था और प्रशासन ब्रिटिश शासन से पहले अस्तित्व में नहीं थे।

(2) धार्मिक विभाजन को बढ़ावा देना

ब्रिटिश इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास को हिंदू और मुस्लिम कालों में बाँटकर सांप्रदायिक भेदभाव को प्रोत्साहित किया। इसका उद्देश्य भारतीय समाज को बाँटना और ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति को लागू करना था।


(3) यूरोपीय दृष्टिकोण से इतिहास लेखन

भारतीय इतिहास को पश्चिमी नजरिए से लिखा गया, जिसमें यूरोप को उन्नत और भारत को पिछड़ा हुआ दिखाने का प्रयास किया गया। उदाहरण के लिए, जेम्स मिल ने अपने ग्रंथ "History of British India" में भारत को अत्यंत पिछड़ा बताया।

(4) ब्रिटिश शासन को भारत का उद्धारक दिखाना

ब्रिटिश शासन को भारतीय समाज के लिए एक ‘सुधारक शक्ति’ के रूप में प्रस्तुत किया गया। यह दिखाने की कोशिश की गई कि अंग्रेजों ने भारत में कानून, आधुनिक शिक्षा, रेलवे, संचार आदि का विकास किया, जो भारतीयों के लिए संभव नहीं था।

उपनिवेशवादी इतिहासकारों के प्रमुख योगदान

(1) जेम्स मिल (James Mill)

  • अपनी पुस्तक "History of British India" (1817) में भारतीय इतिहास को तीन भागों (हिंदू, मुस्लिम, ब्रिटिश) में विभाजित किया
  • भारत को अंधविश्वासी, असभ्य और कुप्रथाओं से भरा हुआ देश बताया
  • उन्होंने यह प्रचारित किया कि ब्रिटिश शासन ही भारत को सभ्य बना सकता है
  • (2) थॉमस मैकॉले (Thomas Macaulay)

  • 1835 में उसने अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली लागू करने की वकालत की
  • भारतीयों की पारंपरिक शिक्षा प्रणाली को पिछड़ा और अनुपयोगी बताया

  • (3) विन्सेंट स्मिथ (Vincent Smith)

  • अपनी पुस्तक "Early History of India" में भारतीय इतिहास को राजाओं और युद्धों का इतिहास बताया।
  • उन्होंने अशोक और अकबर को महान राजा माना, लेकिन बाकी शासकों को तानाशाह बताया

  • (4) विलियम जोन्स (William Jones)

  • संस्कृत ग्रंथों का अनुवाद किया और भारतीय संस्कृति को एक अलग दृष्टिकोण से देखने का प्रयास किया
  • हालांकि, उनके कार्यों में भी पश्चिमी श्रेष्ठता का दृष्टिकोण दिखाई देता है

  • उपनिवेशवादी इतिहास लेखन की सीमाएँ और आलोचना

    (1) पक्षपाती और पूर्वाग्रही दृष्टिकोण

  • इस इतिहास लेखन में ब्रिटिश शासन को श्रेष्ठ और भारतीय समाज को निम्न दिखाने का प्रयास किया गया
  • भारतीय सभ्यता की उपलब्धियों को नजरअंदाज किया गया

  • (2) भारतीय समाज की गलत व्याख्या

  • भारतीय समाज को पूरी तरह से धार्मिक और परंपराओं से बंधा हुआ दिखाया गया
  • जाति प्रथा और समाज व्यवस्था को अत्यधिक रूढ़िवादी और अपरिवर्तनीय बताया गया

  • (3) भारतीयों की भूमिका को कम आंकना

  • स्वतंत्रता संग्राम, सामाजिक सुधार आंदोलनों और प्रशासनिक क्षमताओं को कम करके आंका गया।
  • भारतीय नायकों की उपलब्धियों को कम महत्व दिया गया

  • (4) सांप्रदायिक भेदभाव को बढ़ावा

  • हिंदू-मुस्लिम समाज के बीच दुर्भावना फैलाने की कोशिश की गई
  • यह सिद्ध करने का प्रयास किया गया कि ब्रिटिश शासन से पहले भारत में निरंतर संघर्ष और अस्थिरता थी

  • उपनिवेशवादी इतिहास लेखन के प्रभाव

    1. भारतीय समाज में सांप्रदायिकता बढ़ी, जिससे हिंदू-मुस्लिम एकता कमजोर हुई।

    2. ब्रिटिश शासन को वैधता मिली, जिससे अंग्रेजों को लंबे समय तक भारत में शासन करने में सहायता मिली।

    3. भारतीय इतिहास के प्रति भारतीयों की सोच प्रभावित हुई, जिससे एक समय तक स्वदेशी इतिहास लेखन धीमा रहा।

    4. स्वतंत्रता संग्राम की प्रेरणा – जब भारतीय इतिहासकारों ने इस दृष्टिकोण की आलोचना की, तो स्वदेशी और राष्ट्रीय इतिहास लेखन की प्रवृत्ति विकसित हुई। 

    निष्कर्ष

    उपनिवेशवादी इतिहास लेखन ने भारतीय इतिहास को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया और ब्रिटिश शासन को महिमामंडित किया। यह दृष्टिकोण पूरी तरह पक्षपाती और औपनिवेशिक हितों से प्रेरित था

    हालांकि, भारतीय इतिहासकारों ने इस दृष्टिकोण की आलोचना की और राष्ट्रीय, समाजशास्त्रीय और मार्क्सवादी इतिहास लेखन को आगे बढ़ाया। आज के समय में इतिहास को अधिक तथ्यात्मक और निष्पक्ष दृष्टिकोण से लिखने की आवश्यकता है, ताकि भारतीय इतिहास को सही परिप्रेक्ष्य में देखा जा सके।


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